शहद की एक बूंद के लिए मधुमखी द्वारा किया गया परिश्रम

एक मधुमक्खी अपने पूरे जीवनकाल मे सिर्फ एक चम्मच के बाराह मे भाग जितना शहद ही निर्माण कर पाती है । जिसे वह सिर्फ अपने लिए तैयार नहीं करती बल्कि आनेवाली बच्चों के लिए करती हे।

आपको ये जानके आश्चर्य होगाकी मधुमखीका जीवनकाल सिर्फ ४५ से ६० दिन का ही होता हे| उनके जीवनका एक मात्र लक्ष्य उनके परिवारके लिए भोजनका प्रबंध(संग्रह) करना और उनकी रक्षा करना होता हे।

एक मधुमक्खी को एक बूंद शहद बनाने के लिए पंद्रह से अधिक फूलो का रस एकत्र करना पड़ता है।

छत्ते मे लाखो मधुमक्खियां होती है एक किलो शहद बनाने के लिये सभी मक्खियों द्वारा काटा जानेवाला कुल अंतर ४२०० किमी से भी अधिक होता है । यह अंतर पुर्थ्वी के एक चक्कर लगाने के बराबर होता हे।

हजारों सालो से मनुष्य शहद प्राप्त करने के लिए बहुत ही क्रूर तरीके का इस्तमाल करता आ रहा हे। मधुमक्खी के छतो में से शहद प्राप्त करने के लिए छते के निचे घुवा करके छतो को निचोड़ कर शहद निकला जाता हे. इस प्रक्रिया के दोरान बहुत बड़ी संख्या में मधुमक्खियों, अंडे, बच्चे और लार्वा मर जाते है। छता निचोड़ कर शहद निकालने की प्रक्रिया के दोरान उसमे मधुमक्खी, अंडे, बच्चे और लार्वा की जैविक अशुद्धि शहद में मिल जाती हे. इसकी वजह से शहद ज्यादा समय तक संभाला नहीं जा सकता. शहद प्राप्त करने के इस क्रूर तरीके की वजह से पृथ्वी पर से मधुमक्खी की कई प्रजातिया नष्ट हो गयी हे।

पोष्टिक गुणों से भरपूर शहद भारतीय लोग बहुत कम इस्तेमाल करते हे. भारतीय लोगो के दैनिक आहार में शहद का स्थान नहीं हे. शहद को केवल एक दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है और उसकी वजह भी धर्म हे। शहद निकाल ने की इस हिंसक प्रकिया दोरान बहुत ज्यादा मात्रा में मधुमक्खी मर जाती हे, इसलिए भारतीय लोग शहद का कम इस्तेमाल करते हे।

मधुमखी पालन में शहद अहिंसक तरीके से प्राप्त किया जाता हे। इस वैज्ञानिक तरीके में मधुमखीके छतेको नुकसान नहीं पहोचाया जाता हे। जिसकी वजह से मधुमखीका परिवार विकास कर पाता हे। मधुमक्खी पालन शोषण नहीं पोषण का कार्य हे। आप सब लोगो से हमारी विनंती हे के मधुमक्खी पालन से प्राप्त अहिंसक शहद का प्रयोग करे जिससे मधुमक्खी पालन को प्रोत्साहन मिले और इस निर्दोस जीवो की हत्या की परम्परा ख़त्म हो।

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