आयुर्वेद में शहद का वर्णन

शहद कम से कम ४००० हजार सालो से भारत में आयुर्वेदिक चिकत्सा में इस्तेमाल किया जाता हे। यह कहा गया हे की शहद द्रष्टि को बढाने में, वजन घटाने में, शीघ्रपतन के सुधार में, मूत्रपथ के विकार में , दम ,दस्त और मतली के इलाज में उत्तम हे।

शहद को 'योगवाही' कहा जाता हे क्योकि शहद में शरीर के गहरे स्नायु तक पहोचने की गुणवता हे।

जब शहद अन्य हर्बल मिश्रण के साथ प्रोयाग किया जाता हे, तब उन मिश्रण के औषधीय गुणों को बढ़ता हे और उन्हें गहरे स्नायु तक पहोचनेमें मदद मिलती हे।

भावप्रकाशसंहिता मधूवर्गा

संस्कृत श्लोक जो शहद के महत्व का प्रतिनिधित्व करता है

अनुवाद : शहद पचाने में आसान, स्वादिष्ट, आंखो के लिए फायदेमंद, शरीर के लिए ठंडा, खासी को खीच कर दूर करने वाला, भूख जागृत करने वाला, अच्छी आवाज निर्माता, चिकत्सीय गुण, नर्म त्वचा प्रदाता, छोटी रक्त तक पहोचकर लाभ प्रदान करने वाला हे। प्रारंभिक स्वाद में मीठा होता हे और अंत में कसैले स्वाद वाला, ख़ुशी प्रदान करने वाला, मस्तिष्क की शक्ति में सुधार करता, यौन शक्तिको विकसित करता स्वादिष्ट पदार्थ हे। शहद कब्ज, कुष्ठ रोग, बबासीर, खांसी, अम्लता, रक्तविकार, मधुमेह, कृमि, मोटापा, अत्यधिक प्यास, अस्थमा, श्वास समस्या, हिचकी, जलन, तपेदिक (टी.बी) के उपचार में किया जाता हे।

महर्षि वाग्भट रचित असतानग्रद्रय के चेप्टर -५ के सूत्रस्थान द्रव्यद्रविग्यनीय के श्लोक क्रमांक ५१ और ५२

संस्कृत श्लोक जो शहद के लाभ का प्रतिनिधित्व करता है

अनुवाद : शहद आंखो के लिए फायदेमंद हे, अत्यधिक प्यासको दूर करने वाला, विष विरोधी, मधुमेह, कृमि, उलटी, श्वास समस्या के उपचार में, खांसी और दस्त के उपचार में उपयोगी हे। शहद घाव के लिए प्रक्सालक, खंडित हड्डी, शुष्कता के लिए फायदेमंद हे। मधुशर्करा (जमा हुआ शहद ) का प्रोयोग शहद की तरह किया जाता हे।

आयुर्वेद के आध्यग्रंथ सुश्रुतसंहितामें सूत्रस्थान ४६ द्रव्यविधिधर्याय के शोल्क १३२ में मधू का वर्णनं किया गया हे। इस ग्रंथमें शहदके गुणों का वर्णनं कुछ इस प्रकार किया गया हे।

संस्कृत श्लोक जो शहद के उपयोग का प्रतिनिधित्व करता है