इंडीजीनस हनी और परंपरागत तरीके से प्राप्त शहद में क्या फर्क है?

मधु निष्कर्षण मशीन द्वारा मधु/ शहद निकलना

शहद के साथ मनुष्य बहुत पुराना रिश्ता है। पुरातनकाल में मानव द्वारा खायी गयी पहली मिठाई शहद थी ...! हजारों सालो से मनुष्य शहद प्राप्त करने के लिए बहुत ही क्रूर तरीके का इस्तमाल करता आ रहा हे। मधुमक्खी के छतो में से शहद प्राप्त करने के लिए छते के निचे घुवा करके छतो को निचोड़ कर शहद निकला जाता हे। इस प्रक्रिया के दोरान बहुत बड़ी संख्या में मधुमक्खियों, अंडे, बच्चे और लार्वा मर जाते है। छता निचोड़ कर शहद निकालने की प्रक्रिया के दोरान उसमे मधुमक्खी, अंडे, बच्चे और लार्वा की जैविक अशुद्धि शहद में मिल जाती हे। इसकी वजह से शहद ज्यादा समय तक संभाला नहीं जा सकता. शहद प्राप्त करने के इस क्रूर तरीके की वजह से पृथ्वी पर से मधुमक्खी की कई प्रजातिया नष्ट हो गयी हे।

पोष्टिक गुणों से भरपूर शहद भारतीय लोग बहुत कम इस्तेमाल करते हे। भारतीय लोगो के दैनिक आहार में शहद का स्थान नहीं हे। शहद को केवल एक दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है और उसकी वजह भी धर्म हे। शहद निकाल ने की इस हिंसक प्रकिया दोरान बहुत ज्यादा मात्रा में मधुमक्खी मर जाती हे। इसलिए भारतीय लोग शहद का कम इस्तेमाल करते हे।

किन्तु मधुमक्खीपालन में शहद प्राप्त करने के लिए सेंट्रीफ्यूज मशीन का इस्तेमाल किया जाता हे। जिससे एक भी मधुमक्खी, अंडा और बच्चे को नुकशान पहोचाये बिना शहद निकला जा सक्ता हे। मधुमक्खीपालन में मधुमक्खी को पुरे साल फुल मिलते रहते हे, इसकी वजह से वे जरुरत से ज्यादा शहद का निर्माण करती हे। हम सिर्फ इस अतिरिक्त शहद को ही निकलते हे। आप सब लोगो से हमारी विनंती हे के मधुमक्खीपालन से प्राप्त अहिंसक शहद का प्रयोग करे जिससे मधुमक्खीपालन को प्रोत्साहन मिले और इस निर्दोस जीवो की हत्या की परम्परा ख़त्म हो।

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